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भीड़ का उन्माद, धर्म की हत्या और मानवता का अपमान

लेखक: शीराज़ क़ुरैशी, अधिवक्ता

मैं यह आलेख एक मुसलमान के नाते अत्यंत पीड़ा, आत्मग्लानि और गहरे शोक के साथ लिख रहा हूँ। बांग्लादेश के मायमनसिंह शहर में 25 वर्षीय हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की कथित ईशनिंदा के आरोप में की गई मॉब लिंचिंग ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया है। किसी व्यक्ति को भीड़ द्वारा पहले बेरहमी से पीटना, फिर पेड़ से लटकाना और अंततः उसके शव को आग के हवाले कर देना केवल एक हत्या नहीं है, बल्कि यह धर्म, कानून और मानवता—तीनों का सार्वजनिक अपमान है। एक मुसलमान होते हुए मैं इस घटना से बेहद आहत हूँ, शर्मसार हूँ और गहरे दुख में हूँ, क्योंकि इस बर्बरता को इस्लाम से जोड़ने का प्रयास स्वयं इस्लाम के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।

इस्लाम का मूल संदेश रहमत, इंसाफ और सब्र पर आधारित है। क़ुरआन स्पष्ट रूप से यह घोषणा करता है कि जिसने एक निर्दोष इंसान की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता की हत्या की। पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (ﷺ) का जीवन इस बात का प्रमाण है कि घोर विरोध और अपमान की स्थिति में भी उन्होंने बदले की नहीं, बल्कि न्याय और क्षमा की राह चुनी। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि कौन-सा इस्लाम उस भीड़ को यह अधिकार देता है कि वह अफ़वाहों और उत्तेजना के आधार पर किसी की जान ले ले। सच यह है कि ऐसी घटनाएँ इस्लाम की नहीं, बल्कि उस कट्टरपंथी मानसिकता की उपज हैं जो धर्म को हथियार बना लेती है और हिंसा को धार्मिक कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत करती है।

मॉब लिंचिंग का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसमें विवेक और जवाबदेही दोनों का अंत हो जाता है। भीड़ में शामिल हर व्यक्ति स्वयं को गुमनाम मानकर अपराध करता है और कानून को अपने पैरों तले कुचल देता है। जबकि किसी भी सभ्य समाज में न्याय का अधिकार केवल अदालतों और विधिसम्मत संस्थाओं को होता है, भीड़ को नहीं। जब भीड़ न्याय करने लगती है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं मरता, बल्कि कानून का शासन भी दम तोड़ देता है। दीपू चंद्र दास की हत्या इसी भीड़तंत्र का वीभत्स उदाहरण है।

यह घटना हमें दक्षिण एशिया में धार्मिक अल्पसंख्यकों की असुरक्षा की कड़वी सच्चाई से भी रू-बरू कराती है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में अल्पसंख्यक समुदाय अक्सर अफ़वाहों, कट्टरपंथ और सामाजिक बहिष्कार के साये में जीने को मजबूर हैं। इस्लामी इतिहास इसके विपरीत रहा है, जहाँ अल्पसंख्यकों की जान-माल और आस्था की रक्षा को शासकों ने धार्मिक और नैतिक दायित्व माना। आज यदि मुसलमान बहुल समाजों में ही अल्पसंख्यक भयग्रस्त हों, तो यह गंभीर आत्ममंथन की माँग करता है।

ईशनिंदा जैसे संवेदनशील आरोपों पर विशेष संयम और जिम्मेदारी की आवश्यकता होती है। बिना ठोस प्रमाण के आरोप लगाना स्वयं एक बड़ा गुनाह है और ऐसे मामलों में कानून को अपना काम करने देना धार्मिक और संवैधानिक—दोनों ही दृष्टियों से अनिवार्य है। अफ़वाहें और निजी दुश्मनियाँ जब धार्मिक उन्माद का रूप ले लेती हैं, तो निर्दोष जानें जाती हैं और समाज में स्थायी विभाजन पैदा होता है। यह स्थिति न इस्लाम स्वीकार करता है और न ही कोई सभ्य समाज।

यहीं से भारत में लागू नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी CAA और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी NRC की प्रासंगिकता सामने आती है। इन कानूनों को भावनाओं और भ्रम के बजाय यथार्थ और संवैधानिक दृष्टि से समझना आवश्यक है। CAA किसी भी भारतीय मुसलमान की नागरिकता नहीं छीनता, बल्कि इसका उद्देश्य पड़ोसी इस्लामी देशों में धार्मिक आधार पर प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को मानवीय शरण देना है। जब बांग्लादेश में एक हिंदू युवक को भीड़ जला देती है, जब पाकिस्तान में मंदिरों पर हमले होते हैं और जब अफ़ग़ानिस्तान में सिख और हिंदू पलायन को मजबूर होते हैं, तब भारत द्वारा ऐसे पीड़ितों को संरक्षण देना न केवल संवैधानिक अधिकार है, बल्कि मानवीय कर्तव्य भी है।

एक मुसलमान के नाते मैं यह स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि यदि किसी व्यक्ति को उसके धर्म के कारण प्रताड़ित किया जा रहा है, तो उसे शरण देना इस्लाम के उसूलों के खिलाफ नहीं है। पैग़म्बर-ए-इस्लाम (ﷺ) ने स्वयं शरणार्थियों को मदीना में आश्रय दिया था। उसी परंपरा का आधुनिक, संवैधानिक रूप CAA में दिखाई देता है। इसी तरह NRC का उद्देश्य नागरिकता की पहचान है, न कि किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना। हर संप्रभु राष्ट्र को यह जानने का अधिकार है कि उसके नागरिक कौन हैं, बशर्ते यह प्रक्रिया निष्पक्ष, मानवीय और न्यायपूर्ण हो।

विडंबना यह है कि एक ओर पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक भीड़ की हिंसा का शिकार हो रहे हैं और दूसरी ओर भारत में उन्हें शरण देने वाले कानूनों का विरोध किया जा रहा है। यह विरोध दरअसल विरोध नहीं, बल्कि वैचारिक भ्रम और राजनीतिक दुष्प्रचार का परिणाम है। वास्तविक चुनौती कट्टरपंथ से है, चाहे वह किसी भी धर्म के नाम पर क्यों न हो।

बांग्लादेश सरकार द्वारा इस मामले में की गई गिरफ्तारियाँ एक सकारात्मक कदम हैं, लेकिन न्याय तभी पूरा होगा जब दोषियों को कठोर दंड मिले और यह स्पष्ट संदेश जाए कि भीड़तंत्र को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। साथ ही, धार्मिक नेतृत्व और समाज के जिम्मेदार वर्गों को यह स्पष्ट और निर्भीक संदेश देना होगा कि हिंसा हराम है, अफ़वाह अपराध है और कानून से ऊपर कोई नहीं।

अंततः यह समय खामोशी का नहीं, बल्कि नैतिक साहस का है। हमें यह तय करना होगा कि हम किस इस्लाम के साथ खड़े हैं—रहमत और इंसानियत वाले इस्लाम के साथ या हिंसा और उन्माद वाले नकली इस्लाम के साथ। दीपू चंद्र दास की हत्या हमारे सामूहिक ज़मीर पर एक दाग है, जिसे केवल निंदा से नहीं, बल्कि न्याय, आत्मालोचना और सही नीतिगत निर्णयों से ही मिटाया जा सकता है। कट्टरपंथ का विरोध और मानवता की रक्षा ही धर्म, संविधान और सभ्यता—तीनों की सच्ची सेवा है।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दे, पीड़ित परिवार को न्याय मिले और हम सबको इंसान बने रहने की तौफ़ीक़ अता हो।

— शीराज़ क़ुरैशी

लेखक शासकीय अधिवक्ता एवं भारत फर्स्ट के संयोजक हैं

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